अपने मुल्क से मोहब्बत करो – हुज़ूर मोहम्मद पैगम्बर सल्ल0 अलेह वसल्लिम

अगर आप इस्लाम के अनुयायी है आप का इस्लाम के सिंद्धान्तों पर चलना बहुत जरुरी है अगर आप किसी बी सिद्धान्त को नकारते है तो आप इस्लाम के विरोधी कहलाये जायेंगे. इस्लाम के सिद्धांत यानि कुरआन और मोहम्माद पैगम्बर साहब द्वारा बताये गये रास्तों को इस्लाम के सिद्धांत कहते है.

देश भक्ति और मुल्क परस्ती क्या होती है किसी को बताने की जरुरत नहीं

इन्ही सिद्धन्तो में मुख्य सिद्धान्त ये बी है कि आप जिस देश मुल्क में रह रहे हो उस मुल्क के प्रति वफादारी और मोहब्बत बहुत जरुरी है. अगर आप कोई बी ऐसा काम करते है जो मुल्क के लिए सही नबी हो वह काम आप को इस्लाम से दूर कर देता है .

हम ने दुनिया का नक्शा बनते और बिगड़ते देखा है. और मोहम्मद पैगम्बर साहब के ज़माने की एक सत्य घटना
मोहम्मद पैगम्बर साहब अपनी कई साल की हिजरत के बाद मदीना से मक्का वापस लौटे थे एक जमाना ऐसा था जब मक्का के लोग आप के खून के प्यासे हो गए थे तब आप मोहम्मद साहब ने उन से युद्ध का रास्ता नहीं अपनाया था
आप के चाचा और आप की बीबी हजरत ख़दीजा का इंतेक़ाल (स्वर्गवास) हो चूका था आप के माँ बाप बहुत पहले ही गुजर चुके थे आप निहायत ही अकेले पड़ चुके थे.

ऐसे में मोहम्मद पैगम्बर साहब को अपने रब की तरफ से हुक्म हुआ की वह शांतिपूर्ण तरीके से मदीना चले जाये मदीना के लोगों ने उन का दिल खोलकर स्वागत किया. मगर मक्का के कुरैश कवीले के लोग यह नहीं चाहते थे कुरैश कवीले वालों की मंशा यह थी की मोहम्मद पैगम्बर साहब को क़त्ल कर दिया जाये वह वह लोग इसी मंशा से मदीने की और चल दिए थे.

मक्का के लोग जितना आप के साथ जितना दुर्व्यभार करते थे ठीक उस के बिपरीत मदीना के लोग उन से उतनी ही मोहब्बत करते थे मदीना के लोग हर कदम पर आप का साथ देते थे और आप पर आने वाली हर मुसीवत को अपने ऊपर लेना चाहते थे ठीक उस के बिपरीत मोहम्माद साहब को अपने आप आय ज्यादा अपने साथियो की फ़िक्र रहती थी मुहम्मद साहब मो मक्का की धरती से बहुत लगाब और मोहब्बत थी.

क्योकि यह वही जगह उनके माता पिता के मुबारक कदम पड़े थे इसी जमीन पर कावा था जहाँ इबादत करना उन का एक सपना था.

अपनी मातृ भूमि किसे अच्छी नहीं लगती ?

मदीने में उन्हें इतनी तकलीफ नहीं मिली जितनी तकलीफ उन्हें मक्का के लोगों ने दी थी फिर भी मुहम्मद साहब ने मक्का के लिए बुरा भला नहीं कहा पैगम्बर साहब हमेशा मक्का जाने के लिए बेताब रहते थे और इन्ही सब कारणों के चलते मुहम्मद पैगम्बर साहब ने मक्का के लोगों का दिल जीत लिया जब मुहम्मद साहब मक्का वापस लौटे तो उन के सात बहुत सारे लोगों का काफिला साथ आया जिस पर मक्का के लोग बुरी तरह से डरे हुए थे की हम ने इन पर इतने जुल्म ढाए है अगर इन सब का बदला इन्होंने हम से ले लिया तो हमें मौत से कोई नहीं बचा सकता.

जब मुहम्मद पैगम्बर साहब ने अपने एक करीबी साथी अबु सुफियान से कहा की जाओ और मक्का के लोगों से कह दो की आज मुहम्मद एक भाई की तरह आएंगे और आज न हार का दिन होगा न ही जीत का दिन होगा न ही किसी बी प्रकार से बदले का दिन होगा आज प्रेम मोहब्बत भाई चारे का दिन होगा आप जो हमारे साथ आना चाहता है तो आ जाये जो नहीं आना चाहता वह न आये किसी के साथ किसी भी प्रकार की जोर जबरजस्ती नहीं होगी.

जब यह बात अबु सुफियान ने मक्का के लोगों से कही तो मक्का के हर गलियारे में खुशी की लहर दौड़ गई
मुहम्मद पैगम्बर साहब मक्का में दाखिल हुए और कावे की चाबी मंगाई गई आप मुहम्मद साहब अंदर दाखिल हो गए जिसके बाद मक्का के लोगों की भीड़ लग गई वह लोग आज अपनी किस्मत का फैसला सुनने के लिए खड़े थे जब जब मुहम्मद साहब ने मक्का के लोगो से कहा और कहा में आज आप लोगों के साथ क्या करने बाला हूँ.

सब बोले अच्छा सुलूक करेंगे आप क्योकि आप एक अच्छे भाई और अच्छे इंसान है जिस पर मुहम्मद साहब में कहा जाओ में सब को मुआफ़ करता हु आज तुम्हारी कोई पकड़ नहीं है जब की आप इस समय इतनी ताकत और फ़ौज रखते थे की आप के सामने कोई टिक नहीं सकता था आप अपना बदला बड़ी आसानी से ले सकते थे.

देश भक्ति और मुल्क परस्ती क्या होती है किसी को बताने की जरुरत नहीं है हो सकता है आप के ऊपर जुल्म हो सकता है मगर आप का काम उन को मुआफ़ करने का है और अपने वतन मुल्क देश से मोहब्बत करने का है. यह एक बहुत बड़ा इस्लाम का सिद्धान्त है.